Saturday, January 16, 2010

दिल की बातें

उन्होंने मोहब्बत को खेल, दिल को एक खिलौंना समझा ।
ठोकर खाकर भी, एक बेवफ़ा को हमनें अपना समझा ॥
दिल को जाना था, गया, अब ज़ान पर बन आई है ।
फिर भी उनके हर सितम को हमने अदा समझा ॥


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अपने चहरे पर आप यूँ नक़ाब ना लगाईये ।
चेहरा छुपाकर इस दिल में आग़ ना लगाईये ॥
जल जाने का हमें कोई ग़म नहीं है, लेकिन,
ख़ुद पर आप ये इल्ज़ाम तो ना लगाईये ॥

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Friday, January 15, 2010

मुलाक़ात

हकीक़त में मिले उनसे, ऐसी हमारी क़िस्मत कहाँ ।
मुलाकात भी की हमने, तो ख्वाबो़ में की ॥
टूट ना जायें, ये ख्वाब सुनहरा कहीं आवाज़ से ,
गुफ़्तगू भी की हमने , तो निगाहों से की ॥

Thursday, January 14, 2010

तलाश

ज़िन्दगी माँग रही है मुझसे, हर पल का हिसाब।
और मैं, उन पलो में अपनी उम्र तलाश कर रहा हूँ ।।
यूँ तो दुनियाँ में मेरी पहचान, मेरे नाम से हैं ।
और मैं, अपने नाम में अपना वज़ूद तलाश कर रहा हूँ।।
कल मैने कुछ शब्दो के ज़रिये अपने भावनाओ को रखा था।
माफ़ी चाहूँगा, कुछ तकनीकी कारण से वो पोस्ट शायद सही से छप नहीं पाया और ऐसा लगता था की शब्द बार बार दोहराये जा रहे है । अत: , मैं फिर से उसको दोबारा पेश कर रहा हूँ। त्रुटी के लिये क्षमा प्रार्थी ।

भटकता राही
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अज़नबी शहर में, अकेला भटक रहा हूँ मैं ।
अन्जान राहों में, अकेला भटक रहा हूँ मैं ।।
ठहरे हुए इन हवाओ में , बेवज़ह ,
श्वास तलाश करता भटक रहा हूँ मैं ।।

पत्थर के मकान, पत्थर के भगवान ।
मिला जो भी यहाँ, वो भी पत्थर जैसा ।।
पत्थर की हर मूरत में , बेवज़ह ,
धरकन तलाश करता भटक रहा हूँ मैं ।।

समन्दर है ठहरा हुआ, हवायें हैं रूकी हुई ।
फूल है मुर्झाये हुए, ओस हैं पत्थराई हुई ।।
मरघट से इस आलम में , बेवज़ह ,
ज़िन्दगी तलाश करता भटक रहा हूँ मैं ।।

Tuesday, January 12, 2010

हौसला

हालात से लड़कर तकदीर बदलने का इरादा रखते है !
हम तुफानो में भी कश्ती उतारने का हौसला रखते है !!
बाजू काटकर , हमे कमज़ोर ना समझ, ए नासमझ ,
हम ताकत अपने हाथों में नहीं , जिगर में रखते है !!

एक सवाल ख़ुदा से

तेरे जहाँ में , ए ख़ुदा , ऐसा घर भी है कहीं?
की जिसमे, ग़म के कदमो की आहट न हो !
तेरे जहाँ में, ए ख़ुदा, ऐसी निगाहे भी है कहीं ?
की जिसमे, अश्को का सैलाब न हो !
तेरे चमन में , ए ख़ुदा , ऐसी कली भी है कहीं ?
की जिसके दामन में एक काँटा न हो?
तेरे दिए हुए हर सांस में , एक पल भी है कहीं ?
की जिस पर मौत का साया न हो ?
तेरे बनाये हुए दिल में , ऐसा है क्यों नहीं ?
की नफरत के लिए जिसमे जगह न हो !
ऐसा है क्यों नहीं ?
ऐसा है क्यों नहीं ?

Friday, January 8, 2010

वो जो थे मेरी मुट्ठी में बंद चन्द रेखाए ,

उनको भी चुराकर ले गया कोई ।

लिखी थी जो दास्तान दिल की एक कोरे कागज़ पर ,

रात के अँधेरे में उन्हें मिटा गया कोई ।

रखे थे निगाहों में छुपाकर कुछ आंसू अपने जिगर के ,

चुपके से आकर मुझको रुला गया कोई । ।