Tuesday, March 9, 2010

" नारी " - महिला दिवस के उपलक्ष में

नारी कोमल भी, नारी शक्ति भी,
नारी इश्वर मे लीन भक्ति भी ।
नारी बेटी, बहन, माँ और पत्नी का प्यार भी,
नारी अपने में सिमटा पूरा संसार भी ॥

बेटी बन, पिता की इज़्जत पर आँच ना आने दिया ।
बहन बन, भाई के पास किसी बला को ना जाने दिया ॥
पत्नी बन, पति का जीवन सँवार दिया ।
और माँ बन, सारी बलाईयाँ अपने सर लिया ।

भूखे पेट रहकर, परिवार को खिलाने की ममता नारी में।
निगाहों मे अश्क लेकर मुस्कुराने की क्षमता नारी में ॥
मैका भुलाकर, ससुराल को अपनाने का ज़ज्बा नारी में ।
सुहाग के लिये, यमराज से टकराने का हौसला नारी में ॥

ज़िन्दगी मे नारी की मर्यादा का मान किजीये ।
सरेबाज़ार ना उसकी आबरू कभी निलाम किजीये ॥
वक्त के साथ बेटी ही होती हैं, माँ की ममता का रूप,
जन्म लेने से पहले उसके कफ़न का ना इन्तेजाम किजीये ॥

Saturday, March 6, 2010

नादान ख़्वाब मेरे

कुछ ख़्वाब मेरे निगाहों से कहीं खो गये हैं
गर तुम्हे दिखे कहीं, तो मुझे लौटा देना ।
नादान ख़्वाब मेरे, छोटे छोटे, परेशान से,
गर तुम्हे मिले कहीं, तो मुझे लौटा देना ॥

था बसाया एक छोटा सा संसार कहीं,
थी खुशीयां वहाँ पर, कोई गम नहीं ।
गर चलते चलते पँहुच जाओ वहाँ कभी,
तो पता वहाँ का मुझे भी बता देना ।।

ज़्यादा बड़े नहीं थे वो, थे मासूम वो ,
एक अमन की आस, एक प्यार की प्यास ।
गर तुम्हे मिल जाये कहीं दोनों, बेबस, लाचार,
तो मुझसे भी उन्हें मिला देना ॥

वो मेरी निगाहों मे बसी तुम्हारी परछाई ।
वो तुमसे ज़ुदा हो कर मेरी तन्हाई ॥
गर मिलकर सुनायें तुमको मेरी दास्ताँ कहीं ,
तो मुझे भी उस महफ़िल मे बुला लेना ॥

है वो दुनियादारी से बेखबर, अनजान ।
नहीं उन्हें, भले-बुरे की कुछ पहचान ॥
अश्क बनकर, निगाहों से छलके, खो गये,
गर तुम्हे दिखे कहीं, तो मुझे लौटा देना ।

कुछ ख़्वाब मेरे निगाहों से कहीं खो गये हैं।
गर तुम्हे मिले कहीं, तो मुझे लौटा देना ॥

Monday, March 1, 2010

दिल की भावनायें - होली में

आया फागुन का महिना और होली का पावन त्योहार ।
आओ खोलें हम सब, अपने- अपने दिल के बंद द्वार ॥
हिंसा को करके विदा, दे अमन और भाईचारे को निमंत्रन ।
आओ बाँटे हमसब मिलकर, इस दुनियाँ मे प्यार ॥

अबीर उड़े, गुलाल उड़े, हो आकाश पर रंगो की बौछार ।
सबको मिले इस जहाँ में, दामन भर खुशीयाँ बेशुमार ॥
अब लहू का रंग ना मिले, इन पाक रंगो मे ,
ना रहे इन्सानों मे दिल में, अब नफ़रत की दीवार ॥

ज़िन्दगी मे किसी के गम ना हो, रहे खुशियाँ हजार ।
अश्क लेकर मुस्कान बाँटें, हो सबके ये नेक विचार ॥
भाई, भाई की ज़ान न ले, बेटे ना करे माँ-बाप को बेघर,
मिलकर रहे सब, ना हो किसी रिश्ते में फूट की दरार ॥

थक गयी माँ जननी, सहते-सहते ये बेवज़ह मानव संहार ।
मत डालो, लहू का लाल रंग मुझपर, करे दुखियारी पुकार ॥
हरीयाली रहे बदन पर, रहे सर पर श्वेत पर्वतो का ताज़ ।
माँ की आँचल की छाया मिले, मिले सबको जननी का दुलार ॥

यही प्रार्थना मेरी, यही मेरे मन के विचार ।
मिले सबको धन, यश, सुकूऩ और प्यार बेशुमार ॥
हो जीवन मे आपके आशा के रंगों की बौछार ।
बधाई आप सबको, मुबाऱक होली का त्योहार ॥

Wednesday, February 17, 2010

बाघ के दिल से

कभी तुम थर्र-थर्र कापाँ करते थें हमारी गर्जना से,
आज हम तुम्हारी कदमों की आहट से घबराते हैं ।
कभी तुम नज़रे नहीं मिला पाते थें हमारी नज़र से,
आज हम तुम्हारा सामना करने से कतराते हैं ॥

कभी तुम जागा करते थें रातो को, हमारे खौफ़ से,
आज हम अपने बच्चो को सीने से लगाये रहते हैं ।
सोते हो तुम चैन से, ईट-पत्थरों से बनायें हुए घर पे,
और हम खुले जंगलों मे भागे- भागे फिरते हैं ॥

कभी हम एक, भारी पड़ते थें, तुम्हारे जैसे सैकड़ो पर,
आज तुम्हारी एक गोली से ज़ान बचाकर भागते हैं ।
हमने जब भी संहार किया, मज़बूरी में, पेट के खातिर किया,
पर तुम्हारे जैसे, हमको मार कर दिवार पर सजाते हैं ॥

यूँ तो, कहने को, हम इस देश मे राष्ट्रीयता के प्रतीक हैं ।
पर, बाशिन्दे यहाँ के, हमारे ही खालो का सौदा करते हैं ॥
सुना हैं, अब हम, एक हज़ार चार सौ ग्यारह, ही जीवित बचे हैं ।
आज तुमसे ज़िन्दगी की भीख नहीं, इन्सानियत का दावा करते हैं ॥

Tuesday, February 16, 2010

एक सवाल तुमसे

वो प्यार तुम्हारा मुझसे, था पूरा, या आधा सच था तुम्हारा ।
वो मुझको अपना कहना, था पूरा, या आधा सच था तुम्हारा ॥
वो स्पर्श, वो आलिंगन, वो कोमल हाथों की छुवन ।
वो तुम्हारा मुझ में समाना, था पूरा, या आधा सच था तुम्हारा ॥

वो साथ चलना, वो मुझे गिरते हुए सम्हालना, वो हौसला बढ़ाना ।
वो वादा तुम्हारा मुझसे, था पूरा, या आधा सच था तुम्हारा ॥
वो तुम्हारे निगाहों मे स्वप्न मेरे, वो उन्हे पूरे करने की कस्में ।
वो आँसूओं से भरा पैमाना, था पूरा, या आधा सच था तुम्हारा ॥

वो हँसना, खिलखिलाना, वो मिलकर ज़िन्दगी कि किताब पढ़्ना ।
वो रूठना-मनाना तुम्हारा, था पूरा, या आधा सच था तुम्हारा ॥
वो कभी शर्म से निगाहें झुकाना, कभी बेखौफ़ बाहों में समाना ।
वो मेरे लिये दुनिया ठुकराना, था पूरा, या आधा सच था तुम्हारा ॥

वो एक मोड़ पर तुम्हारा ज़ुदा होना, मेरा उस मोड़ पर इन्तज़ार करना ।
वो तुम्हारा लौटने का वादा, था पूरा, या आधा सच था तुम्हारा ॥
आ जाओ की अब साँसों से रिशता भी खत्म होने को हैं ।
यकीन कर लूँ, तुम्हारा वादा, था पूरा, नहीं आधा सच था तुम्हारा ॥

Friday, February 5, 2010

तुम्हारी याद

रात्री के गहन अन्धकार मे, जब ये सारा जग सो जाता है,
मेरे इन थकी हारी आँखों को नींद क्यों नहीं आती ।
ढ़ूढ़्तीं रहती है, ना जाने पुराने यादों की गठरी मे कोई सामान,
यादों की यह बोझ, मेरे ज़हन से, क्यों नहीं जाती ॥

क्यों ढूढ़ता रहता हूँ, वो धूल की परत हटाकर,
तुम्हारी तस्वीर में, तुम्हारी मुस्कान, तुम्हारा प्यार,
तुम्हारा स्पर्श, तुम्हारी अदा, तुम्हारा कोमल एहसास,
क्यों तुम बेज़ान तस्वीर से बाहर निकलकर नहीं आती ॥

तुम थी, तो रात के अन्धेरें को चीरकर रख दिया था,
तुम्हारे माथे की छोटी बिन्दियां की वो किरण ।
तुम थी, तो रात को जागने को तत्पर रह्ता था मन,
क्यों तुम अब, आसूँओं के ज़रिये भी निगाहों मे नहीं आती ॥

इस रात मे जब चादँ भी अपनी चाँदनी ओढ़कर सो जाता है ,
जब हर शै यहाँ, अपने सपनों की दुनिया मे खो जाता है ।
थमी हुई, इस महफ़िल, मे जब सुनाई देती है खामोंशिया भी,
मेरे इन कानो मे तुम्हारी कोई सदा, क्यों नहीं आती ॥

रात्री के गहन अन्धकार मे, जब ये सारा जग सो जाता है,
मेरे इन थकी हारी आँखों को नींद क्यों नहीं आती ।

Monday, February 1, 2010

क्या क्या ना भूला, ज़िन्दगी में

कल, टेलिविशन के एक चेनेल (सब) पर "तारक मेहता का उल्टा चश्मा" देख रहा था। ये सीरियल मुझे अच्छा लगता है, क्योंकी यह एक पारीवारिक माहौल दर्शाता हैं । जो बात मुझे छू गयी, वो यह कि, जब मैने सीरिअल में बच्चो को गुड्डो - गुड़ीयों का खेल व्याह रचाते हुए देखा । अचानक ज़हन मे आया, इतनी सादगी, बच्चो मे कहाँ हैं ? बाकी हर चेनेल पर बच्चे या तो नये फ़िल्मी गानो मे मटकते हुए मिलेंगे या फिर बड़ो जैसे जोक्स दोहराते हुए मिलेंगे । वैसे, उनको क्या दोश दे, हम खुद कितना कुछ इस भाग - दौड़ भरी ज़िन्दगी में भूल गये । बच्चे तो कोमल, निर्झर जल की तरह होते हैं, जिस साँचे मे ढाले जायेगें, वैसे ही ढलेंगे ।

पर मै यह सोचने पर मज़बूर हो गया, कि, क्या - क्या ना भूला इस ज़िन्दगी मे । नीचे दी हुई निम्नलिखित पंक्तियों मे कुछ दिल की खोई हुई चीज़े हैं, जिसका मुझे आज अफ़सोस होता है ।

क्या क्या ना भूला, ज़िन्दगी में

ज़िन्दगी की भाग दौड़ में,
हम रुक कर सम्भलना भूल गये ।

आगे बढ़्ने की ज़द्दोज़हद में,
पीछे मुड़्कर देखना भूल गये ॥

सबको देखकर मुस्कुराने की आदत हो गई,
मगर, जी खोल कर हसंना भूल गये ।

सात समन्दर पार कर लिया, मगर,
काग़ज की कश्ती बनाना भूल गये ॥

कभी, तारे गिन गिन कर रात जागा करते थे,
अब तो आसमाँ की तरफ़ देखना भूल गये ॥

ईमारतो और गाड़ीयों में कट रही ज़िन्दगी,
अब हम पैदल घास पर चलना भूल गये ।

यूँ तो मँज़िल दर मँज़िल पार करते रहे,
और अपने घर का रास्ता भूल गये ॥

पराये को अपनाने की चाहत में ,
हम अपनो से मिलना भूल गये ।

मिलते रहे लोगों से हाथ से हाथ बढ़ाकर,
हाथ जोड़ कर अभिनंदन करना भूल गये ।।

डर रहे हैं हम आंतकियों से, लुटेरो से,
मगर, भगवान से डरना भूल गये ।

घर, दफ़्तर, होटलो में सिमटकर रह गई ज़िन्दगी,
और मंदिर की घन्टी बजाना भूल गये ॥

दुनियादारी निभाने में इतना मशगुल हुए,
माँ - बाप का खयाल रखना भूल गये ।

अपने होंठों पर मुस्कान चाहते रहे सदा,
दूसरो की आँखों से आँसू पोछना भूल गये ॥

’गुड लक’ कह्कर भेज दिया, इन्तिहान में बेटे को,
उसके माथे पर, दही का टीका लगाना भूल गये ।

सजाया घर को खरीदे हुए गुलदस्तों से, मगर,
अपने आँगन मे तुलसी का पौधा लगाना भूल गये ॥

ज़िन्दगी की भाग दौड़ में,
हम रुक कर सम्भलना भूल गये ॥