Thursday, March 25, 2010

तलाश

मिट गई है जो अपने हाथों से, वो लकीरे ढूढ़ंते रहे ।
तराश सके हमारे तकदीर को, ऐसा कारीगर ढूढ़ंते रहे ॥
दूर होकर भी भुला ना पाया है, ये दिल उनको,
फ़ासलों के दरमियाँ हम नज़दिकीयाँ ढूढ़ंते रहे ॥

तेरे होठों पर एक मुस्कुराहट की ख्वाईश लिये,
तमाम उम्र, काटों के चमन में कलीयाँ ढूढ़ंते रहे ।
यकीन कुछ इस कदर था, तेरे वादे पर हमे,
हम अमावस की रात में पूनम का चाँद ढूढ़ंते रहे ॥

घर के आंगन मे जलता था जो चराग़ कभी,
उसकी लौ, हम शहर की बिजलियो मे ढूढ़ंते रहे ।
सिमट कर रह गई हैं ज़िन्दगी चार दिवारो में,
बन्द कमरे मे रहकर, खुला आसमान ढूढ़ंते रहे ॥

सामने था, जो रोते बच्चो को ताउम्र हसाँया किया,
और हम मंदिर-मस्ज़िद, उम्र भर, ख़ुदा को ढूढ़ंते रहे ।
आज निगाहें है ना जाने क्यों, अश्को से डबडबाई हुई,
बुढ़ापे के दहलीज़ पर, बचपन की किलकारियाँ ढूढ़ंते रहे ॥

24 comments:

  1. यकीन कुछ इस कदर था, तेरे वादे पर हमे,
    हम अमावस की रात में पूनम का चाँद ढूढ़ंते रहे
    और
    सिमट कर रह गई हैं ज़िन्दगी चार दिवारो में,
    बन्द कमरे मे रहकर, खुला आसमान ढूढ़ंते रहे
    ये दोनों शेर बहुत अच्छे लगे. मुबारकबाद

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  2. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  3. तेरे होठों पर एक मुस्कुराहट की ख्वाईश लिये,
    तमाम उम्र, काटों के चमन में कलीयाँ ढूढ़ंते रहे ।
    यकीन कुछ इस कदर था, तेरे वादे पर हमे,
    हम अमावस की रात में पूनम का चाँद ढूढ़ंते रहे ॥


    सुंदर शब्दों के साथ.... ..........बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....

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  4. तेरे होठों पर एक मुस्कुराहट की ख्वाईश लिये,
    तमाम उम्र, काटों के चमन में कलीयाँ ढूढ़ंते रहे ।
    यकीन कुछ इस कदर था, तेरे वादे पर हमे,
    हम अमावस की रात में पूनम का चाँद ढूढ़ंते रहे ॥
    behad khoobsurat rachna ,achchhi lagi .

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  5. बहुत ही शानदार और लाजवाब रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! इस उम्दा रचना के लिए बधाई!

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  6. Mubarakbaad kubool farmaayen!
    Maza aa gaya!
    Behatareen virodhabhas se labrez hai aapki rachna, faaslon mein nazdikiyaan, amavas mein poonam ka chaand!
    Sadhuwad!

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  7. बहुत खूब भावनाओं की सुन्दर अभिव्यक्ति

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  8. शानदार,लाजवाब, बढ़िया.............
    aane waali rachnaon ka intzaar rahega......
    also visit my blog.....

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  9. यकीन कुछ इस कदर था, तेरे वादे पर हमे,
    हम अमावस की रात में पूनम का चाँद ढूढ़ंते रहे ..

    गुनाह किया तेरे वादे पे एइत्बार किया ......
    बहुत अच्छा लिखा है आपने .. मज़ा आ गया पढ़ कर ..

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  10. मिट गई है जो अपने हाथों से, वो लकीरे ढूढ़ंते रहे ।
    तराश सके हमारे तकदीर को, ऐसा कारीगर ढूढ़ंते रहे ॥
    दूर होकर भी भुला ना पाया है, ये दिल उनको,
    फ़ासलों के दरमियाँ हम नज़दिकीयाँ ढूढ़ंते रहे ॥
    Harek panktike liye wah!

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  11. meri nayi rachna jaroor dekhein, aapki pratikriya ka intzaar rahega...

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  12. घर के आंगन मे जलता था जो चराग़ कभी,
    उसकी लौ, हम शहर की बिजलियो मे ढूढ़ंते रहे ।

    bahut khoobsurat panktiyan hain...

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  13. shandar....atiuttam.....dher sari badhaiyan

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  14. bahut sundar rachna
    dipayan sahab
    घर के आंगन मे जलता था जो चराग़ कभी,
    उसकी लौ, हम शहर की बिजलियो मे ढूढ़ंते रहे ।
    abhar...........

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  15. http://i555.blogspot.com/ mein is baar तुम मुझे मिलीं....
    jaroor dekhein...
    tippani ka intzaar rahega.

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  16. यकीन कुछ इस कदर था, तेरे वादे पर हमे,
    हम अमावस की रात में पूनम का चाँद ढूढ़ंते रहे ॥
    वाह....वाह.......!

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  17. is baar mere blog par ek english poem....
    hope your comments will come...

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  18. mere blog par is baar..
    वो लम्हें जो शायद हमें याद न हों......
    jaroor aayein...

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  19. mere blog par is baar..
    नयी दुनिया
    jaroor aayein....

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  20. Padhke gayi thi,lekin phir ekbaar padhneka man kiya...gahrayi hai,aur ek baarme thaah nahi lagta!

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  21. आपकी यह रचना बहुत सुन्दर है ! भावनायों में गहराई है, लिखने का लहजा खुबसूरत है, बस एक बात कहना चाहूँगा की ज़रा सा काफिये का ध्यान रखियेगा... बाकी सब ठीक है ...बहुत सुन्दर है ! उम्मीद है मेरे सुझाव का बुरा नहीं मानेंगे ...

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  22. सिमट कर रह गई हैं ज़िन्दगी चार दिवारो में,
    बन्द कमरे मे रहकर, खुला आसमान ढूढ़ंते रहे ॥

    रचना बहुत सुन्दर है ! KEEP IT UP.....

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  23. सिमट कर रह गई हैं ज़िन्दगी चार दिवारो में,
    बन्द कमरे मे रहकर, खुला आसमान ढूढ़ंते रहे ॥

    रचना बहुत सुन्दर है ! KEEP IT UP.....

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