Thursday, March 18, 2010

नाकाम मोहब्बत

परिन्दे भी अब इस शहर से रवाना हो चले ।
कि इस शहर के पेड़ो पर अब शाखे नहीं रही ॥

जो तुमको देख कर जी बहला लेते थे कभी,
इस चेहरे पर अब वो निगाहें नहीं रही ॥

आज हर तरफ़ हैं अन्धेरा अपनी बाहें फैलाये हुए,
राह दिखलाती जो, वो रोशनी की किरणे नहीं रही ॥

छोड़ कर चल देना तुम्हारा, यूँ बेबस मुझको, मुनासिब था,
जो तुमको लगाये रखे सीने से, अब वो बाहें नहीं रही ॥

अब तो बिछड़ने का गम और ये लाचार सन्नाटा है घेरे हुए,
दिल को बहलाती हुई तुम्हारी वो मोहब्बत की बातें नहीं रही ॥

दफ़्न कर रहे हैं मुझे मेरी यादों के साथ, अब कैसे कहे उनसे ।
हर साँस कर रही थी उनका इन्तेज़ार,कि अब साँसें नहीं रही ॥

8 comments:

  1. har pankti dil ko choo jatee hai.........aisee pratiksha ab kanha.....:?
    ab to too nahee aur sahee ka jamana aa gaya hai.................
    aap poore dil se likhate hai bahut accha lagata hai aapke blog par aana.....
    shubhkamnae................

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  2. बहुत अच्छी कविता।

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  3. बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति! उम्दा प्रस्तुती!

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  4. ek bahut hi behatareen gazal,khoobsurat prastuti,
    aabhar.

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  5. हर शेर दिल से निकला है ... बहुत लाजवाब ...

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  6. हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  7. ब तो बिछड़ने का गम और ये लाचार सन्नाटा है घेरे हुए,
    दिल को बहलाती हुई तुम्हारी वो मोहब्बत की बातें नहीं रही ॥

    दफ़्न कर रहे हैं मुझे मेरी यादों के साथ, अब कैसे कहे उनसे ।
    हर साँस कर रही थी उनका इन्तेज़ार,कि अब साँसें नहीं रही ॥
    bahut hi sundar

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